Tuesday, January 4, 2011

आतंक के दशक में उभरा मजबूत भारत 
जैसे जैसे साल २०१० जाने को है वैसे वैसे एक दशक भी समाप्ति की और है और साल २०११ में हम एक नए साल के साथ एक नए दशक का स्वागत करने को नई  उमंग के साथ तैयार है 
साल २०१० भ्रस्ट्राचार  के साल के रूप में याद किया जायेगा वहीँ यह साल जनता के जागरूक होने के साल के रूप में भी जाना जायेगा जिसका उदाहरण जनता ने बिहार के चुनावों में दिया साथ ही साथ यह साल आपसी भाईचारे और न्याय पालिका के प्रति अपना विश्वास कायम के रूप में जाना जायेगा जिसमें राम जन्मभूमि के न्याय्याल्ये के निर्णय का सभी पक्षों ने स्वागत किया बल्कि विश्व को भी दिखा दिया की भारतीय जनता अब समझदार हो गयी है गाहे बेगाये राजनेताओं ने फिर अपनी उसी सोच को उजागर किया जो पिछले दस सालों से करते आ रहे है और कई बार धार्मिक भावनाओं को भड़काने का प्रयास किया और कश्मीर को लेकर बयानबाजी की जिसका जनता ने तीखा विरोध किया! 
भारत की दो मुख्य पार्टियों को अब यह समझ जाना चाहिए की धार्मिक राजनीती की अब हमारे यहाँ कोई जगह नहीं और विकास , नागरिक सुरक्षा और आम जरूरत को मुख्य मुद्दा बनाना है भ्रस्ट्राचार एक ऐसा मुद्दा है जिसकों लेकर जनता त्रस्त  है और इससे मुक्ति चाहती है चाहे इसकों लेकर सरकार को कड़े कदम क्यों न उठाने पड़े लेकिन जनता अब इसको और झेलने को तैयार नहीं और इससे इतर कोई मुद्दा जनता को मंजूर नहीं यही कारन है बिहार में केंद्रीय सत्तादारी पार्टी ने मुहं की खाई है तुस्टीकरण को लेकर कई राजनीती पार्टियाँ अब भी वही सोच रखे है लेकिन उनकी ये सोच गलत साबित होगी इतना तो तय है! भारतीय जनता ने न्यायपालिका में जो इस बार अपनी आस्था जताई है वो काबिले तारीफ़ है और नेताओं के लिए एक सबक भी जनता चाहती है की उनके द्वारा दिया जाने वाले टैक्स की जगह उनके देश में हो स्विस बैंकों में नहीं ! 
साल २००१ यानि दशक की शुरुआत में ही आतंकियों के द्वारा अमेरिका पर अघोषित हमले ने पुरे विश्व को सकते में डाल दिया और ये सोचने को मजबूर कर दिया की कहीं ये दशक आतंक की भेट तो नहीं चढ़ने वाला और ये सोच गलत भी नहीं थी इसी वर्ष आतंकियों ने भारतीये संसंद पर आक्रमण करके ये जता दिया की वो जो सोच रहे है वही सही है और इसका असर भारत पर सबसे ज्यादा दिखा एक के बाद एक भारत के विभन्न शहरों में आतंकियों ने हमले किये और पूरे दशक भारत की जनता को परेशान रखा और दशक के अंत आते आते भारत की आर्थिक राजधानी मुंबई को कई दिन तक हिलाए रखा जिसकों भारत ने क्या पुरे विश्व ने देखा और भारत की कमजोर सुरक्षा व्यवस्था पर सवाल खड़े किये! साल २०१० और दशक के जाते जाते बनारस को फिर निशाना बनाया गया और भारतीय सुरक्षा पर प्रशन चिन्ह फिर लग गया बयान राज्ये और केंद्रे सरकार दोनों ने दिए लेकिन सुरक्षा की जिम्मेदारी लेने और भविष्य में और मजबूत सुरक्षा देने की बात किसी ने नहीं कही !
अमेरिका ने दशक की शरुआत में हुए उस पर हमले को चुनौती के रूप में लिया जिसके लिए उसने छाज को भी फूंक फूंक कर पीने की कवायद को सार्थक किया इसके लिए कई बार उसने अन्य देशो के राजनेताओं और चर्चित हस्तियों को भी सुरक्षा के नाम पर बेइज्जत किया लेकिन उसने इसके लिए अपने देश की सुरक्षा का हवाला देते हुए न केवल विरोधियों के मुहं बंद किये बल्कि अपनी जनता और वहां आने वाले व्यापारियों और भ्रमणकारियों को जता  दिया की अमेरिका से सुरक्षित जगह कोई नहीं और भारत के राजनेताओं ने अपनी कमजोरियों को और आपसी फूट को जगजाहिर करते हुए हमेशा  इन हमले के लिए न केवल पडोसी देश पर सवाल खड़े किये बल्कि सुरक्षा के नाम पर अमेरिका पर निर्भर होने में ज्यादा उत्सुकता दिखाई जिसका असर यह हुआ की आतंकी और ज्यादा प्रभावी हुए और पूरे विश्व में यह सन्देश गया की एक छोटे से देश भी भारत अपनी सुरक्षा नहीं कर सकता इसके लिए उसकों अमेरिका की जरूरत पड़ती है हमारे राजनेताओं को अब यह समझ लेना चाहिए की सुरक्षा के नाम पर अब भारतीय जनता आप से आपेक्षा रखती है किसी और देश से नहीं भारतीय जनता चाहती है की भारत के राजनेता ये बयान दे की हम अपनी सुरक्षा करने में सक्षम है इसके लिए हमें किसी और देश की जरूरत नहीं आने वाले समय में सुरक्षा एक अहम् मुद्दा बनने वाला है     
यह दशक आर्थिक और सामाजिक स्तर पर एक मजबूत भारत का निर्माण के रूप में भी याद किया जायेगा भारत ने जहाँ आर्थिक रूप से चारों और अपना डंका बजाया जिसमें समस्त औधोगिक घरानों ने अभूतपूर्व उप्लाभ्दी हासिल की वो चाहे मित्तल ग्रुप हो या टाटा या अम्बानी या हीरो ,सभी ने बहार  के देशों की कपनियों का अधिग्रहण कर ये जाता दिया की भारतीये व्यापारी किसी से कम नहीं यही नहीं आर्थिक मंदी ने भी भारत को एक मजबूत आर्थिक देश का दर्जा दिलाने में महत्त्व पूर्ण योगदान दिया और सफलता दिलाई भारत ने  दुनिया को दिखा दिया की आर्थिक रूप से वह कितना शक्ति शाली देश है यही नहीं अन्य देशो में हुए सम्मेलनों में भारत ने एक जिम्मेदार देश के रूप में अपना नाम दर्ज किया और दिखाया की विश्व के महत्व पूर्ण फैसलों में भारत की रजामंदी को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता! 
साल के और दशक के अंत महत्वपूर्ण देशों के राजनेताओं ने देश में आकर न केवल इसको सलाम किया बल्कि  पुरे विश्व को बताया भारत से बेहतर देश कोई नहीं इन सभी नेताओं ने जहाँ अपने देशो के लिए भारत से काम और व्यापार माँगा बल्कि जय हिंद का नारा भी लगाया लेकिन भारत के नेता आपसी फूट के कारन यहाँ भी कमजोर ही नजर आये और बदले में कुछ भी हांसिल नहीं कर पाए !
अंत में भारत की न्यायपालिका की तारीफ़ करना नहीं भूलूंगा की उन्होंने अपना सामाजिक दयित्वे निभाने में कोई कसर  नहीं छोड़ी और कई सामाजिक मुद्दों पर न केवल सरकार से सवाल जवाब किया बल्कि कई महत्वपूर्ण मुद्दों पर निर्णय सुनाया लेकिन थोड़ी सी कमजोर वो जरूर दिखाई दी जब वो पकडे गए आतंकियों को सजा दिलवाने में नाकाम रही और वो अगले वर्ष जनता को मुहं चिड़ाते रहेंगे इस सवाल का जवाब न केवल भारत का अवाम मांग रहा है बल्कि पूरा विश्व मांग रहा है की पकडे गए अताकियों पर वो इतनी नरम क्यों है और उनकी सजा में इतनी देरी क्यों ? आने वाले साल और दशक में न्याय पालिका को और मजबूती दिखानी ही होगी क्योकि भारत की न्यायपालिका विश्व की बेहतरीन न्यायपालिका में से एक है ! 
आने वाला वर्ष और दशक न केवल भारत के नाम होगा बल्कि यहाँ की जनता को और उनकी सोच को उच्चतम शिखर पर ले जायेगा इसी कामना के साथ 
जय हिंद 
आशुतोष दा 

Friday, December 31, 2010

टोपी उछालने का मतलब

समाचार पत्रों में यदा कदा किसी शिक्षण संसथान के वार्षिक समारोह या किसी कोर्स के पूरा होने पर डिग्री या उपाधि देने के समारोह के दौरान समारोह के अंत में प्रशिक्षित विधार्थियों का अपने टोपी उछाल कर हर्ष को प्रदर्शित करने के फोटो छपते रहते है इन फोटो को देख कर मुझे हमेशा  से ही यह महसूस हुआ की ये जो परंपरा इसकी शुरुवात कहीं से भी हुई हो गलत है हाल ही में मेरठ में हुए दीक्षांत समारोह के दौरान अंत में टोपी उछालते हुए प्रशिक्षित विधार्थियों का फोटो दैनिक जागरण में देखा तो में अपने को इसके ऊपर लिखने से रोक नहीं सका 
हमारे भारतीय संस्कारों में टोपी का विशेष महत्व है टोपी को एक इज्जत के रूप में जाना जाता है कई मुहावरे भी इसी आधार पर बने है जैसे सरे बाज़ार टोपी उछालने का मतलब इज्जत उछालने से है या टोपी पैरों के निचे मसलना इज्जत का कबाड़ा करने से है या टोपी को किसी के हाथ में रख देने का मतलब मेरी इज्जत आपके हाथ में है टोपी निचे न गिरने देने का मतलब इज्जत संभाले रखने से है टोपी सरे आम नीलाम करने का मतलब सरे आम बेइज्जत करने से है 
तमाम ऐसे उदाहरण है जिसमें टोपी को भारतीय संस्कृति में इज्जत के रूप में देखा जाता है यही नहीं अन्य देशो में भी टोपी को आदर का दर्जा दिया जाता है घरों में भी टोपी रखने के स्थान होता या दिवार पर टांगने के लिए बाकायदा जगह बनी होती है या लकड़ी का फ्रेम बना कर उस पर खूंटी लगायी  जाती है जिस पर टोपी टांगी जा सके 
तो इतनी महत्वपूर्ण चीज को उछाल कर ख़ुशी का इजहार करने की परंपरा समझ से परे है जो उछालने के पश्चात् जमीन पर गिरती है जिस टोपी को पाने के लिए आपने इतनी मेहनत की उस टोपी को उछाल कर ख़ुशी जाहिर करना,  उस टोपी का या दुसरे शब्दों में उस डिग्री का निरादर करने जैसा है
इस गलत परंपरा पर शिक्षण संस्थानों को ध्यान देना चाहिए और इस पर रोक लगानी चाहिए जिससे एक गलत परंपरा का अंत हो ! 
आशुतोष दा

समस्या से पार पाने में उर्जा का उपयोग करें

वास्तव में जीवन जीना जितना आसान है उतना ही कठिन भी है लेकिन जब जीवन सकारत्मक है तब तक आदमी खुश है जरा सा नकारात्मक हुआ नहीं की कुंठा होनी शुरू, फिर शुरू होता है दोषा रोपण क्योंकि मनुष्य की प्रवत्ति स्वं को को सर्वश्रेष्ठ सिद्ध करने की है उसके अनुसार गलती दुसरे करते है यही कारन है हम उन समस्याओं को और बढ़ा देते है जैसे छोटी सी समस्या को ले लेते है घर में बिजली का बिल जरूरत से ज्यादा आ गया या टेलिफ़ोन का बिल ज्यादा आ गया बस दोषा रोपण शुरू हो ज्यादा है तुम लाइट ज्यादा चलाते हो नहीं तुम सारे दिन टीवी देखते रहते हो तुम यहाँ तहां फोन करते हो तुम घंटो बात करती हो और लड़ाई शुरू जिसका असर न सिर्फ हमारे बच्चों पर पड़ता है बल्कि वो भी दोषरोपण की इस प्रवत्ति को अपने अंदर डाल  लेते है कल स्कूल टीचर  ने ऐसा कह दिया कल टीचर  ने वैसा कर दिया गलती उसकी डाट  मेरी पड़ी आये दिन हमें भी इस तरह की शिकायत सुनने को घर में अपने बच्चो से मिलती है ये सब वो कहाँ से सीखते है यक़ीनन वो हमीं से सीखते है सोचिये अगर बिजली या टेलिफ़ोन का बिल ज्यादा आने पर सभी लोग आगे से अपनी जिम्मेदारी को द्रड़तापुर्वक पालन करने की मन ही मन शपथ ले और इसका केवेल सदुपयोग करें तो यक़ीनन ये छोटी सी समस्या पल भर में हल हो जाती है बजाय  इसके घर में महायुद्ध हो इस तरह से हम बच्चो को भी सिख देते है की समस्या से पार पाने में ही भलाई है दोषरोपण में नहीं तभी आपका बच्चा कल को बाहर  खलने के बाद किसी की शिकायत लेकर घर नहीं आएगा क्योकिं उसकों समस्या से पार आना आ जायेगा इस तरह हम न केवल अपनी उर्जा जो हम कुंठा होने या एक दुसरे पार दोषा रोपण करने में खर्च करते वही उर्जा हम जीवन मैं आगे बढ़ने  में खर्च करेगें सोचिये जब भी घर में महा भारत होता है उसका सीधा असर काम पर पड़ता है या बच्चा अगर किसी से झगड़ता है उसका सीधा असर उसकी पढाई  पर पड़ता है जो हमें जीवन में आगे बदने में बांधा पहुंचाती  है जिससे हम जीवन में उतना आगे नहीं बढ़ पते जितना की हमें होना चाहिए हाल ही में सुश्री मायावती और पि चिदम्बरम का बयां देख कर कुछ ऐसा ही लगा अगर ये अपनी उर्जा को दोषारोपण में न खर्च कर इस समस्या से और द्रड़ता  से पार पाने में खर्च करें उससे न केवल समस्या का निवारण होगा बल्कि संचय उर्जा का अन्य कामों में खर्च होगा अगर हम श्रेष्ठ व्यक्तियों को ले जो जीवन में सफल है तो हम पायेगें की यक़ीनन उनके अंदर भी यही गुण होगा वो दोषारोपण से ज्यादा समस्या का समाधान करने को प्राथमिकता देते है
आशुतोष दा

Monday, November 15, 2010

आशीर्वाद की महत्ता

आशीर्वाद की महत्ता 
आज जहाँ सभी लोग तरक्की की राह में अग्रसर है वहीँ आज का युवा पुराने संस्कारो को भूलता जा रहा है जैसा की कहीं जाने से पहले बड़ो का पैर छु कर आशीर्वाद लेना जो ब्बाय डैड या मोम, ब्बाय दादाजी या दादीजीजवाब भी उनको  वैसा ही मिलता है क्योकि आज के युवा को समझाना बड़ा मुश्किल हो गया है! पैर छुना पुराना फैशन मानने वाले युवा को शायद हम लोग आशीर्वाद की महत्ता समझा नहीं पा रहे है या हम लोग भी इस दौर को अपना कर इसे झंझट समझ कर पल्ला झाड़ लेते है जबकि हकीकत यह है की पैर छु कर लिया आशीर्वाद अन्दर से आता है जहाँ ईशवर का निवास होता है की जाओ ईशवर तुम्हारी सहयता एवं रक्षा करे करे और आशीर्वाद देने वाले का हाथ उस मुद्रा में उठ जाता है जिस मुद्रा में ईशवर का हाथ सदैव रहता है ! क्या कारन है वैसा भाव नमस्ते या बाय कहना में नहीं उठतामैंने जब इस बारे में कई बुजर्गो से पूछा तो सबका जवाब लगभग एकसा था की जब हम किसी को बाय या टाटा करते है उस स्थिथि में जाने वाला अपने जाने की सुचना मात्र देता है और पैर छुकर जाने वाला आपसे जाने से पहले एक सुरक्षा कवच जो मार्ग में उसकी रक्षा करे और सुरक्षित वापस घर आने तक साथ रहे और सफलता चाहता है जो की केवल ईशवर ही दे सकते है यही कारन है जब कोई पैर छूता है तो पैर छुने वाला भक्त और जिसके पैर छु रहा है वह इश्वर प्रदत्त हो जाता है और अपना हाथ उठा देता है!
हाथ उठा का दिया हुआ आशीर्वाद हमेश फलीभूत होता है जिससे उसको सुरक्षा कवच और सफलता मिलती है बशर्ते पैर छुने वाला दोनों हाथ से दोनों पैर छुए, क्या कारन है की हाथ उठा कर दिया हुआ आशीर्वाद फलीभूत होता है और किस व्यक्ति विशेष का आशीर्वाद सैदव फलीभूत होता है उसका कारन है उस व्यक्ति का निःस्वार्थ सदाचार उसके गुण उसका खानपान प्रभु के प्रति उसकी आस्था जो उसको ईशवर प्रद्दत बनता है और यही सब जो उसके हाथ उठाने मात्र से अद्रश्य किरणों के रूप में आशीर्वाद लेने वाले के चारो तरफ एक घेरा  बना लेती है जो सुरक्षा कवच का काम करती है और उसको उसके कार्य जिसके लिए वो आशीर्वाद चाहता है में सफलता दिलाती है  

यह मेरा अपना अनुभव भी है की कई बार  अपने किसी बड़ो के पैर छूकर या किसी महात्मा और सज्जन पुरुष के पैर छुकर जाने पर मुश्किल काम  भी  ऐसा चुटकियों में हो जाता है जो की हमने सपने में भी नहीं सोचा था यही कारन है की हमारे माता पिता ने सदैव ही हमे पैर छुने  की आदत डालने के लिए  केवल  दबाव बनाया बल्कि उसकी महत्ता भी बताई! मेरा ये लेख लिखने का मकसद भी यही है की युवा इसे अपनी आदत में शामिल करे और अपनी सफलता और सुरक्षा का मार्ग प्रशश्त करे
आशुतोष गुप्ता